संसार में सारे मुसलमानों की शादियाँ इस्लामी शादी कानून के तहत होती है.इस्लाम में शादी के दो अलग -अलग कानून हैं :-
1.सुन्नी मुसलमानों के लिए हनफी कानून और
2.शिया मुसलमानों के लिए इस्नाअशरी कानून .
इस्लामी शादी का पालन केवल मुसलमानों के लिए ही संरक्षित हैं.
इस्लामी शादी कैसे की जाती है ?
इस्लामी शरा के मुताबिक पहले शादी का पैगाम लड़के की तरफ से दिया जाता है.इस पैगाम को लड़की कुबूल करती है या इंकार करती है.अगर पैगाम कुबूल होता है तो इस पैगाम देने और कुबूल करने को ‘निकाह’ कहते हैं| निकाह जुबानी भी हो सकती है |
जायज़ निकाह के लिय कुछ जरूरी बातें :-
- निकाह के वक्त मौलवी की मौजूदगी और गवाहों की मौजूदगी
- मौलवी के पास शादी की एक किताब होती है जिस पर मौलवी निकाह दर्ज करते हैं|इस किताब में दूल्हा -दुल्हन दोनों और गवाहों के बाद मौलवी के द्वारा दस्तखत किया जाता है|
- मौलवी दूल्हा-दुल्हन दोनों को एक-एक पर्चा देते हैं जिसे ‘निकाहनामा’ कहा जाता है जिस पर शर्तों व दोनों पक्षों के गवाहों और मौलवी के मौजूदगी की जानकारी लिखी होती है|
- निकाह जुबानी भी हो सकती है|
- निकाह जायज़ होने के लिए ‘मेहर’की रकम तय होना और रकम का ज़िक्र निकाहनामे में होना जरुरी है|यह रकम लड़का लड़की को शादी के बदले में देता है| अक्सर शादी के वक्त यह रकम नही दी जाती इसके बदले लड़का लड़की को वादा करता है लड़की जब भी वह रकम मांगेगी .वह उसे देना पड़ेगा |वह वादा निकाहनामे व शादी के किताब में दर्ज़ किया जाता है|




